Friday, February 07, 2014

अमेरिका से तल्खी का नया अध्याय

देवियानी प्रकरण के बाद भारत और अमेरिका के रिश्तों में तल्खी का एक नया अध्याय और जुड़ गया हैं। अमेरिका के विमान नियामक फैडरल एविएशन एडमिनिस्टेशन ने भारत की विमान सुरक्षा रेंटिग को घटाकर कैटिगिरी - 1 से कैटिगिरी -2 कर दिया हैं। एफएए ने भारतीय विमान महानिदेशालय की स्थिति और कार्याप्रणाती के आॅडित के आधार पर यह डाउनग्रेडिंग दी हैं। इसके बाद भारत अमेरिका के लिए अपनी उड़ानों में वृद्धि नहीं कर सकता साथ ही भारतीय हवाई जहाजों को अमेरिका में सख्त चेकिंग से गुजरना होगा।
भारत की ग्रेंिडंग घटाने की आशका पिछले साल सिंतम्बर से ही जताई जा रही थी। जब पहली बार एफएए की टीम ने भारत आकर डीजीसीए के जाॅच कर 31 बिन्दुओं पर असंतोष जताया था साथ ही चेतावनी दी थी की यदि इन बिन्दुओं को दुरूस्त नहीं किया तो भारत की ग्रेडिंग कम कर दी जाएगी। तीन महीने बाद दिसंम्बर में एफएए की टीम में फिर भारत का दौरा किया । तब डीजीसीए 29 बिन्दुओं पर काफी हद तक एफएए को सतुष्ट करने में कामयाब रहा था। मगर दो मामलों में एफएए की टीम फिर भी असंतुष्ट थी। इसमें एअरवर्दीनेस अफसरों के प्रशिक्षण की सुविधाओं के आभाव के अलावा  के अलावा फलाइट आॅपरेशंस इंस्पेक्टरों की कमी और इसे पूरा करने के लिए निजी एयरलाइनों के पायलटों का एफओआइ के रूप में इस्तेमाल के मसले प्रमुख थे। विमान मंत्रालय ने इन दोनों चिंताओं पर एफएए को संतुश्ट करने के लिए अभी दो कुछ रोज पहले ही कैबिनेट निर्णय लेकर 75 एफओआइ की भर्ती करने के साथ-साथ एयरवर्दीनेस अफसरों के लिए टेनिंग प्रोग्राम शुरू करने का एलान किया था। साथ ही डीजीसीए के स्थान पर सीएए बनाने का विधेयक संसद से जल्द पारित कराने का भरोसा दिया था। अमेरिका की ओर से भारत की बांहे मरोडने के प्रयास तभी स ेचल रहे थे जबसे भारत ने डीमलादनरों में नुक्स को लेकर बोइंग से हर्जाना वसूलने की बातें शुरू की थी। इसी के बाद से एफएए ने भारत की एविएशन सेफटी को लेकर सवाल खड़े करने शुरू कर दिए थे। यदि इंटरनेशनल सिविल एविएशर्न आॅनाइजेशन के आॅडिट को देखा जाए तो कानूनी और संगठनात्मक ढांचे की स्थिति, लाइसेंस व्यवस्था, आॅपरेशन, एयरवर्दीनेस, दुर्घटना जांच, एयर नेवीगेशन और हवाई अड्डों समेत सभी आठ पैमानों पर अंतराष्टीय औसत के मुकाबले भारत की रैंकिंग काफी बेहतर है। ऐसे में केवल इंस्पेक्टरों की कमी मसले को अमेरिका द्वारा तूल देकर ग्रेडिंग घटाना समझ से परे हैं। इसी आधार पर एविएशन विशेषज्ञों ने भी अमेरिकी कदम को राजनैतिक माना है। विशेषज्ञों का मनना है कि इससे भारतीय एयरलाइनों के भविश्य के विस्तार कार्यक्रम प्रभावित हो सकते हैं। खासकर एयर इंडिया और जेट एयरवेज की अमेरिकी उड़ानें बढ़ाने की योजनाओं पर बुरा असर पड़ सकता है।
 अभी एयर इंडिया अमेरिका के लिए 21 जेट सात साप्ताहिक उड़ानें भरती है। इसके अलावा स्टार एलायंस का सदस्य बनने की एयर इंडिया की तैयारियां भी प्रभावित हो सकती हैं। स्टार एलायंस विश्व की प्रमुख एयरलाइनों का संगठन है। घटे पर अंकुश व वित्तीय स्थिति में सुधार के बाद पिछले दिनों ही संगठन ने एयर इंडिया को सदस्य बनाने के लिए दरवाजे खोले हैं। मगर अब प्रक्रिया में देरी संभव है।

Friday, November 15, 2013

अन्तवहीन आतंकवाद !

भारत में पिछले कई दशकों पहले पनपे आतंवाद ने आज जमीन में अपनी जडे़ इस प्रकार से मजबूत कर ली है। जो मानो अन्तवहिन आतंकवाद हो। देश में आतंकवाद की शुरूआत एक छोटे से भूभाग में फैले असंतोष ने कब अलग अलग राज्यों को विभिन्न समस्याओं के कारण अपनी गिरफत में कर लिय मानों किसी को पता ही न चला। जो क्षेत्रा आतंकवाद से लम्बे समय से झुलस रहे है। वह जम्मू कश्मीर, मुम्बई, मध्य भारत (नक्सलवाद) पूर्वोउत्तर के सात राज्य जो स्वतंत्रता और स्वसत्ता के लिए विभिन्न संगठनो के रूप में अपने द्वारा आतंकी घटनाओं को अजाम दे रहे है। सन 2008 में राष्ट्रीय सुरक्षा सलहाकर एम के नारायण के कहे अनुसार देश के अन्दर 800 आतंकी संगठन विभिन्न क्षेत्रों में सक्रीय है। लेकिन देश का शासन वर्ग आतंकवाद से लड़ने में अपने को हमेश असमर्थ ही महसूस करतो है। देश के विभिन्न हिस्सों में आतंकवादी विदेशी सरजमी या अपनी ही जमी पर कुकुरमुत्ते की तरह उग कर आतंक की इबारत को मनमाफिक शहर में लिख कर गायब हो जाते है। जिन्हे देश की प्रमुख सुरक्षा एजेंसी तक पकड़ने में नाकाम रहती है। सुरक्षा एजेंसी सूचना के आभाव का विलाप करती है। वही शासन भविष्य में आतंकी घटना न होने का कोरा आश्वासन देकर अपना पल्ला पूरे तरीके से झाड़ लेता है रह जाता है आतंकी घटना में पीडि़त और जिसे शक के आधार पर गिरफतार किया जाता है समाचार चैनलों को मिल जाती है खबर मुम्बई आतंकी हमले के बाद फिर पटरी पर दौड़ने लगी।
 भारत को अन्य देशों से सबक लेना चाहिए जहां आतंकवाद ने अपने पैर फेलाने की कोशिश की उन्हे निस्तेनाबूत कर  वह देश आज आतंक के साये से बाहर है। 9/11 के बाद अमेरीका ने अपनी सुरक्षा व्यवस्था इतनी मजबूत की हैं कि पिछले लम्बे समय से वहां कोई आतंकी घटना नही हुई हैं। भारत को भी अपनी आतंरिक व वाह सुरक्षा में वैसे परिवर्तन लाने की जरूरत है। जैसा अमेरीका ने 9/11 के बाद अपनी सुरक्षा में किए है अमेरीका में ऐसा नहीं है कि आतंकवादीयों ने किसी घटना को अजमा देने की कोशिश न की हों लेकिन सुरक्षा व्यवस्था इतनी मजबू है की बेनाम आतंकी भी पकड़े जाते हैं । याद कीजिए फेसल शहजाद की कहानी एक मई 2010 को शहजाद ने न्यूयार्क टाइम्स में एक कार बम धमाके की काशिश की थी। सैकड़ो की तादाद मे लोग मरते अगर कुछ लोगों ने गाड़ी से घुआ निकले हुए देखकर पुलिस को खबर न की होती । पुलिस को शहजाद को पकड़ने में दो दिन का वक्त लगा लेकिन भारत में 26/11से कोई सबक न लेते हुए अपनी सुरक्षा इंतजाम मे कोई बड़ा परिवर्तन नहीं किया । जिसका जवाब दिल्ली हाइकोर्ट पर आतंकी हमले के रूप में भारत को भुगतना पड़ा आतंकवादियां ने हाईकोर्ट पर हमला करने से पहले रिहर्सल तक किया था। 
यदि हम अतीत में झाक कर देखे तो पाएगे पंजाब का वह असंतोष जो कभी अलग देश की मांग लेकर आतंक का गढ़ बनता जा रहा था। लेकिन कुछ सही निर्णयों ने आज पंजाब को पुनः अमन और खुशहाली के रास्ते पर अग्रसर कर दिया। क्या देश के राजनेता इससे कोई सबक नहीं लेते ?

पिछले दो दशकों में आतंवादियों की पहली पंसद मंुबई रही है। चाहे वह 1993 के बम धमाके हो, अगस्त 2003 में झावेरी बाजार और गेटवे आफ इंडिया में कारो मे रखे बम धमाके, जुलाई 2006 में श्रृख्लाबद्ध तरीके से ट्रेनों में सात धमाके अथवा 26/11 की दर्दनाक घटना आतंकीयो का मकसद ज्यादा से ज्यादा नुकसान और अधिक से अधिक आतंक फैलाने का मकसद। लेकिन पिछले कुछ समय से देखा जा रहा है। आतंकी अब बड़े शहरों की अपेक्षा धार्मिक स्थान और भीड़भाड वाले वह स्थान चुनते है। जहाॅ सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं है। जिसका उदाहरण बोधगया, गाँधी मैदान हैं। देश में आतंकवाद को बढ़ाने में विदेशी ताकते अपना पूरा दमखम लगती है। लेकिन हमारे देश में भी ऐसे संगठन, धार्मिक नेताओं की कोई कमी नहीं है। जो अपने गैरजिम्मेदाराना बयानों के चलते युवाओं को गुमराह करने के साथ भावनाओं को भड़काने की पुरजोर कोशिश करने से बाज नहीं आते है। देश में ऐसे संगठनों प्रतिबन्धित करने के साथ धार्मिक भावनाओं को भड़काने वाले व्यक्तिओं के खिलाफ कठोर कार्यवाहीं को अंजाम देने का समय आ गया है साथ ही अपने सुरक्षा तंत्र के तालमेल को बेहर बनाने में उपयुक्त कदम उठाने के साथ दृढ़ इच्छा शक्ति का प्रर्दशन देश का शासन वर्ग करे।

Friday, July 06, 2012

cbi ek kamjor kadi

सुप्रीम कोर्ट ने आय से अधिक संपत्ति के मामले में मायावती को राहत दे दी है और एफआईआर को रद्द कर दिया. इसे मायावती की विजय माना जाय अथवा कॉग्रेस का राष्ट्रपति चुनाव से  पुर्व वित् मंत्री के पकछ  में मतदान करने के लिए उपहार स्वरूप एक छोटा सा तोफा ...................?????? 

Monday, December 26, 2011

rahul ki majburi

उत्तर प्रदेश में चुनावी रणभेरी बजने के बाद पहली बार अवाम से मुखातिब हुए कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने दावा किया कि राज्य की जनता के गैर कांग्रेसी सरकारें चुनने से सूबे के 22 साल बर्बाद हुए हैं और सिर्फ कांग्रेस ही इस प्रदेश को विकास की राह पर ला सकती है.
क्या राहुल बताएगे की देश को  कांग्रेस के ६० सालो के शासन में केवल भ्रस्टाचार के आलावा कांग्रेस ने  दिया  क्या है  ?
कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने   देश  में   ६० सालो के शासन के बाद प्रदेश में  पांच साल का  शासन मागा है क्या राहुल प्रदेश को  महाराष्ट्र बनाने का सपना दिखा कर प्रदेश को दूसरा विद्हरब बनाना चाहते है .
           कांग्रेस नेता ने कहा कि प्रदेश के क्षेत्रों के सम्यक विकास के प्रति गम्भीर चिंता जताते हुए मुख्यमंत्री ने राज्य को चार हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव तो पारित कर दिया, लेकिन सबसे पिछड़े बुंदेलखण्ड इलाके में उपेक्षा से परेशान लोगों की सुध लेने नहीं गयीं.
क्या देश की केंद्र सरकार की  जिम्मेदारी बुंदेलखंड की नहीं है या सिर्फ ये प्रदेश का मामला है . राहुल जी जब आप ही  विद्हरब  में जाने के बाद   विद्हरब की हालत नहीं बदल सके जहा किसान आज भी आत्म हत्या करने पर मजबूर है . तो प्रदेश की मुख्यमंत्री से क्या बुंदेलखंड और प्रदेश को बदलने की उमीद की जा सकती है











Sunday, September 11, 2011

एक और हिंदी दिवस

चौदह सितंबर समय आ गया है एक और हिंदी दिवस मनाने का आज हिंदी के नाम पर कई सारे पाखंड होंगे जैसे कि कई सारे सरकारी आयोजन हिंदी में काम को बढ़ावा देने वाली घोषणाएँ विभिन्न तरह के सम्मेलन इत्यादि इत्यादि। हिंदी की दुर्दशा पर घड़ियाली आँसू बहाए जाएँगे, हिंदी में काम करने की झूठी शपथें ली जाएँगी और पता नहीं क्या-क्या होगा। अगले दिन लोग सब कुछ भूल कर लोग अपने-अपने काम में लग जाएँगे और हिंदी वहीं की वहीं सिसकती झुठलाई व ठुकराई हुई रह जाएगी।

ये सिलसिला आज़ादी के बाद से निरंतर चलता चला आ रहा है और भविष्य में भी चलने की पूरी पूरी संभावना है। कुछ हमारे जैसे लोग हिंदी की दुर्दशा पर हमेशा रोते रहते हैं और लोगों से, दोस्तों से मन ही मन गाली खाते हैं क्यों कि हम पढ़े-लिखे व सम्मानित क्षेत्रों में कार्यरत होने के बावजूद भी हिंदी या अपनी क्षेत्रीय भाषा के प्रयोग के हिमायती हैं। वास्तव में हिंदी तो केवल उन लोगों की कार्य भाषा है जिनको या तो अंग्रेज़ी आती नहीं है या फिर कुछ पढ़े-लिखे लोग जिनको हिंदी से कुछ ज़्यादा ही मोह है और ऐसे लोगों को सिरफिरे पिछड़े या बेवक़ूफ़ की संज्ञा से सम्मानित कर दिया जाता है।

सच तो यह है कि ज़्यादातर भारतीय अंग्रेज़ी के मोहपाश में बुरी तरह से जकड़े हुए हैं। आज स्वाधीन भारत में अंग्रेज़ी में निजी पारिवारिक पत्र व्यवहार बढ़ता जा रहा है काफ़ी कुछ सरकारी व लगभग पूरा ग़ैर सरकारी काम अंग्रेज़ी में ही होता है, दुकानों वगैरह के बोर्ड अंग्रेज़ी में होते हैं, होटलों रेस्टारेंटों इत्यादि के मेनू अंग्रेज़ी में ही होते हैं। ज़्यादातर नियम कानून या अन्य काम की बातें किताबें इत्यादि अंग्रेज़ी में ही होते हैं, उपकरणों या यंत्रों को प्रयोग करने की विधि अंग्रेज़ी में लिखी होती है, भले ही उसका प्रयोग किसी अंग्रेज़ी के ज्ञान से वंचित व्यक्ति को करना हो। अंग्रेज़ी भारतीय मानसिकता पर पूरी तरह से हावी हो गई है। हिंदी (या कोई और भारतीय भाषा) के नाम पर छलावे या ढोंग के सिवा कुछ नहीं होता है।

माना कि आज के युग में अंग्रेज़ी का ज्ञान ज़रूरी है, कई सारे देश अपनी युवा पीढ़ी को अंग्रेज़ी सिखा रहे हैं पर इसका मतलब ये नहीं है कि उन देशों में वहाँ की भाषाओं को ताक पर रख दिया गया है और ऐसा भी नहीं है कि अंग्रेज़ी का ज्ञान हमको दुनिया के विकसित देशों की श्रेणी में ले आया है। सिवाय सूचना प्रौद्योगिकी के हम किसी और क्षेत्र में आगे नहीं हैं और सूचना प्रौद्योगिकी की इस अंधी दौड़ की वजह से बाकी के प्रौद्योगिक क्षेत्रों का क्या हाल हो रहा है वो किसी से छुपा नहीं है। सारे विद्यार्थी प्रोग्रामर ही बनना चाहते हैं, किसी और क्षेत्र में कोई जाना ही नहीं चाहता है। क्या इसी को चहुँमुखी विकास कहते हैं? ख़ैर ये सब छोड़िए समझदार पाठक इस बात का आशय तो समझ ही जाएँगे। दुनिया के लगभग सारे मुख्य विकसित व विकासशील देशों में वहाँ का काम उनकी भाषाओं में ही होता है। यहाँ तक कि कई सारी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अंग्रेज़ी के अलावा और भाषाओं के ज्ञान को महत्व देती हैं। केवल हमारे यहाँ ही हमारी भाषाओं में काम करने को छोटा समझा जाता है।

हमारे यहाँ बड़े-बड़े नेता अधिकारीगण व्यापारी हिंदी के नाम पर लंबे-चौड़े भाषण देते हैं किंतु अपने बच्चों को अंग्रेज़ी माध्यम स्कूलों में पढ़ाएँगे। उन स्कूलों को बढ़ावा देंगे। अंग्रेज़ी में बात करना या बीच-बीच में अंग्रेज़ी के शब्दों का प्रयोग शान का प्रतीक समझेंगे और पता नहीं क्या-क्या।

कुछ लोगों का कहना है कि शुद्ध हिंदी बोलना बहुत कठिन है, सरल तो केवल अंग्रेज़ी बोली जाती है। अंग्रेज़ी जितनी कठिन होती जाती है उतनी ही खूबसूरत होती जाती है, आदमी उतना ही जागृत व पढ़ा-लिखा होता जाता है। शुद्ध हिंदी तो केवल पोंगा पंडित या बेवक़ूफ़ लोग बोलते हैं। आधुनिकरण के इस दौर में या वैश्वीकरण के नाम पर जितनी अनदेखी और दुर्गति हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं की हुई है उतनी शायद हीं कहीं भी किसी और देश में हुई हो।

भारतीय भाषाओं के माध्यम के विद्यालयों का आज जो हाल है वो किसी से छुपा नहीं है। सरकारी व सामाजिक उपेक्षा के कारण ये स्कूल आज केवल उन बच्चों के लिए हैं जिनके पास या तो कोई और विकल्प नहीं है जैसे कि ग्रामीण क्षेत्र या फिर आर्थिक तंगी। इन स्कूलों में न तो अच्छे अध्यापक हैं न ही कोई सुविधाएँ तो फिर कैसे हम इन विद्यालयों के छात्रों को कुशल बनाने की उम्मीद कर सकते हैं और जब ये छात्र विभिन्न परीक्षाओं में असफल रहते हैं तो इसका कारण ये बताया जाता है कि ये लोग अपनी भाषा के माध्यम से पढ़े हैं इसलिए ख़राब हैं। कितना सफ़ेद झूठ? दोष है हमारी मानसिकता का और बदनाम होती है भाषा। आज सूचना प्रौद्योगिकी के बादशाह कहलाने के बाद भी हम हमारी भाषाओं में काम करने वाले कंप्यूटर नहीं विकसित कर पाए हैं। किसी पढ़े-लिखे व्यक्ति को अपनी मातृभाषा की लिपि में लिखना तो आजकल शायद ही देखने को मिले। बच्चों को हिंदी की गिनती या वर्णमाला का मालूम होना अपने आप में एक चमत्कार ही सिद्ध होगा। क्या विडंबना है? क्या यही हमारी आज़ादी का प्रतीक है? मानसिक रूप से तो हम अभी भी अंग्रेज़ियत के गुलाम हैं।

अब भी वक्त है कि हम लोग सुधर जाएँ वरना समय बीतने के पश्चात हम लोगों के पास खुद को कोसने के बजाय कुछ न होगा या फिर ये भी हो सकता है कि किसी को कोई फ़र्क न पड़े। सवाल है आत्मसम्मान का, अपनी भाषा का, अपनी संस्कृति का। जहाँ तक आर्थिक उन्नति का सवाल है वो तब होती है जब समाज जागृत होता है और विकास के मंच पर देश का हर व्यक्ति भागीदारी करता है जो कि नहीं हो रहा है। सामान्य लोगों को जिस ज्ञान की ज़रूरत है वो है तकनीकी ज्ञान, व्यवहारिक ज्ञान जो कि सामान्य जन तक उनकी भाषा में ही सरल रूप से पहुँचाया जा सकता है न कि अंग्रेज़ी के माध्यम से।

वर्तमान अंग्रेज़ी केंद्रित शिक्षा प्रणाली से न सिर्फ़ हम समाज के एक सबसे बड़े तबक़े को ज्ञान से वंचित कर रहे हैं बल्कि हम समाज में लोगों के बीच आर्थिक सामाजिक व वैचारिक दूरी उत्पन्न कर रहे हैं, लोगों को उनकी भाषा, उनकी संस्कृति से विमुख कर रहे हैं। लोगों के मन में उनकी भाषाओं के प्रति हीनता की भावना पैदा कर रहे हैं जो कि सही नहीं है। समय है कि हम जागें व इस स्थिति से उबरें व अपनी भाषाओं को सुदृढ़ बनाएँ व उनको राज की भाषा, शिक्षा की भाषा, काम की भाषा, व्यवहार की भाषा बनाएँ।

इसका मतलब यह भी नहीं है कि भावी पीढ़ी को अंग्रेज़ी से वंचित रखा जाए, अंग्रेज़ी पढ़ें सीखें परंतु साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि अंग्रेज़ी को उतना ही सम्मान दें जितना कि ज़रूरी है, उसको सम्राज्ञी न बनाएँ, उसको हमारे दिलोदिमाग़ पर राज करने से रोकें और इसमें सबसे बड़े योगदान की ज़रूरत है समाज के पढ़े-लिखे वर्ग से ,युवाओं से, उच्चपदों पर आसीन लोगों से, अधिकारी वर्ग से बड़े औद्योगिक घरानों से। शायद मेरा ये कहना एक दिवास्वप्न हो क्यों कि अभी तक तो ऐसा हो नहीं रहा है और शायद न भी हो। पर साथ-साथ हमको महात्मा गांधी के शब्द 'कोई भी राष्ट्र नकल करके बहुत ऊपर नहीं उठता है और महान नहीं बनता है' याद रखना चाहिए।